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रिशु श्री टेंडर घोटाले में बड़ा खुलासा: 124 करोड़ के बिल पास कराने के लिए 22 इंजीनियरों के तबादले का दावा

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रिशु श्री टेंडर घोटाले की जांच में नया खुलासा सामने आया है। जांच एजेंसियों के सूत्रों के अनुसार 124 करोड़ रुपये के लंबित बिलों को पास कराने के लिए 22 इंजीनियरों और जेई के विशेष तबादले किए गए थे। मामले की जांच लगातार जारी है।

पटना/आलम की खबर:बिहार के बहुचर्चित रिशु श्री टेंडर घोटाले में जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, वैसे-वैसे नए और गंभीर आरोप सामने आते जा रहे हैं। अब जांच एजेंसियों से जुड़े सूत्रों के हवाले से जो जानकारी सामने आई है, उसने पूरे मामले को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। दावा किया जा रहा है कि राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी सात निश्चय योजना के तहत संचालित ‘हर घर नल का जल’ परियोजना में लंबित पड़े लगभग 124 करोड़ रुपये के भुगतान को मंजूरी दिलाने के लिए विभागीय स्तर पर विशेष व्यवस्था की गई थी। आरोप यह है कि इस भुगतान प्रक्रिया को तेज करने के उद्देश्य से जल संसाधन विभाग के 22 इंजीनियरों और जूनियर इंजीनियरों को नगर विकास विभाग के विभिन्न निकायों में तैनात किया गया था।

हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि जांच एजेंसियों द्वारा सार्वजनिक रूप से नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों के अनुसार जांच के दौरान कई ऐसे दस्तावेज और तथ्य सामने आए हैं जिनकी पड़ताल की जा रही है। यही कारण है कि अब यह मामला केवल टेंडर आवंटन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विभागीय तबादलों, प्रशासनिक फैसलों और भुगतान प्रक्रिया तक इसकी जांच का दायरा बढ़ता दिखाई दे रहा है।

सूत्रों के अनुसार जिन शहरी निकायों में कुछ कंपनियों के भुगतान लंबे समय से लंबित थे, उन्हीं क्षेत्रों में इन इंजीनियरों की तैनाती की गई। बताया जा रहा है कि लगभग तीन महीने तक ये अधिकारी संबंधित निकायों में कार्यरत रहे और इसी अवधि के दौरान बड़ी संख्या में लंबित फाइलों का निपटारा किया गया। जांच एजेंसियां यह जानने की कोशिश कर रही हैं कि क्या यह केवल प्रशासनिक आवश्यकता थी या फिर इसके पीछे कोई संगठित रणनीति काम कर रही थी।

जांच से जुड़े लोगों का कहना है कि कई मामलों में तकनीकी परीक्षण, गुणवत्ता सत्यापन और परियोजना समीक्षा जैसी प्रक्रियाओं को बेहद कम समय में पूरा किया गया। अब एजेंसियां यह पता लगाने का प्रयास कर रही हैं कि क्या सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी की गई थीं या कहीं नियमों की अनदेखी हुई। इसी बिंदु पर जांच का फोकस सबसे अधिक केंद्रित बताया जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक कुछ फाइलों को निपटाने के लिए छुट्टी के दिनों में भी कार्यालय खोले जाने की जानकारी सामने आई है। यदि जांच में यह तथ्य प्रमाणित होता है तो यह पूरे मामले को और गंभीर बना सकता है। अधिकारियों का मानना है कि इतने बड़े वित्तीय भुगतान की प्रक्रिया में प्रत्येक स्तर पर लिए गए निर्णयों की समीक्षा आवश्यक है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि सभी कदम नियमों के अनुरूप उठाए गए थे या नहीं।

जांच एजेंसियों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वास्तव में विशेष तबादलों के माध्यम से भुगतान प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश हुई, तो इसके पीछे निर्णय लेने वाले स्तर पर कौन-कौन लोग शामिल थे। एजेंसियां इस पूरे नेटवर्क की परतें खोलने में जुटी हुई हैं और संबंधित दस्तावेजों की जांच कर रही हैं। सूत्रों का कहना है कि मामले में कई प्रशासनिक और वित्तीय निर्णयों की भी समीक्षा की जा रही है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में मौजूद रिशु श्री का नाम पहले भी कई गंभीर आरोपों के साथ जुड़ चुका है। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की जा रही जांच में यह आरोप सामने आया था कि वह कथित तौर पर विभिन्न सरकारी परियोजनाओं और टेंडर प्रक्रियाओं में प्रभाव रखने वाला व्यक्ति था। जांच रिपोर्टों में दावा किया गया है कि कुछ मामलों में टेंडर से जुड़ी गोपनीय जानकारियां समय से पहले हासिल की जाती थीं और उसके बाद निविदा प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया जाता था।

ईडी की जांच में यह भी आरोप लगाया गया है कि कुछ ठेकेदारों को लाभ पहुंचाने के बदले कमीशन लिया जाता था। हालांकि इन आरोपों पर अंतिम निष्कर्ष न्यायिक और जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा, लेकिन एजेंसियों की जांच ने पूरे मामले को बिहार के सबसे चर्चित आर्थिक मामलों में शामिल कर दिया है।

जांच एजेंसियों के अनुसार रिशु श्री और उससे जुड़े नेटवर्क की वित्तीय गतिविधियों की भी गहन जांच की जा रही है। रिपोर्टों में दावा किया गया है कि बड़ी मात्रा में संपत्ति अर्जित किए जाने के आरोपों की जांच हो रही है। ईडी का आरोप है कि कथित तौर पर करोड़ों रुपये की संपत्ति विभिन्न माध्यमों से अर्जित की गई। इनमें कई परियोजनाओं और सरकारी योजनाओं से जुड़े भुगतान भी जांच के दायरे में हैं।

स्वच्छ गंगा मिशन, नल-जल योजना और अन्य विकास परियोजनाओं से जुड़े वित्तीय लेन-देन भी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं। एजेंसियां बैंकिंग रिकॉर्ड, दस्तावेजी साक्ष्य और अन्य वित्तीय जानकारियों के आधार पर पूरे नेटवर्क को समझने की कोशिश कर रही हैं। इसके साथ ही कथित हवाला लेन-देन के पहलुओं की भी जांच की जा रही है।

राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में भी इस मामले को लेकर चर्चा तेज है। विपक्ष लगातार सरकार से पारदर्शी जांच की मांग कर रहा है, जबकि सरकार का कहना है कि जांच एजेंसियां स्वतंत्र रूप से अपना काम कर रही हैं और दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इस बीच आम लोगों की नजर भी इस मामले पर बनी हुई है क्योंकि इसमें सार्वजनिक धन और विकास योजनाओं से जुड़े आरोप शामिल हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में लगाए गए आरोपों की पुष्टि होती है तो यह केवल एक व्यक्ति या संस्था तक सीमित मामला नहीं रहेगा, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रियाओं की समीक्षा की भी आवश्यकता होगी। वहीं यदि आरोप प्रमाणित नहीं होते हैं तो जांच एजेंसियों को भी अपने निष्कर्षों के आधार पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। फिलहाल पूरा मामला जांच के चरण में है और अंतिम सच्चाई आधिकारिक जांच रिपोर्ट तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही सामने आएगी।

फिलहाल इतना तय है कि रिशु श्री टेंडर घोटाले ने बिहार की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था में हलचल पैदा कर दी है। 124 करोड़ रुपये के भुगतान, इंजीनियरों के कथित तबादलों और वित्तीय लेन-देन से जुड़े नए दावों ने इस मामले को और अधिक चर्चित बना दिया है। आने वाले दिनों में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और नए खुलासों पर पूरे राज्य की नजर बनी रहेगी।

विकास योजनाओं पर सवाल उठें तो जवाब भी जरूरी है

किसी भी सरकार की विकास योजनाएं जनता के जीवन को बेहतर बनाने के लिए बनाई जाती हैं। लेकिन जब उन्हीं योजनाओं से जुड़े भुगतान, टेंडर और प्रशासनिक फैसलों पर सवाल उठने लगते हैं, तो पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है। रिशु श्री मामले में सामने आ रहे दावे अभी जांच के दायरे में हैं, इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी। फिर भी यह आवश्यक है कि जांच पूरी निष्पक्षता और पेशेवर तरीके से हो ताकि सच सामने आ सके। लोकतंत्र में जनता का भरोसा तभी मजबूत होता है जब सार्वजनिक धन से जुड़े हर निर्णय की पारदर्शी जांच हो और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई हो।

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